सोमवार, 31 दिसंबर 2007

रविवार, 30 दिसंबर 2007

ओस जब बन ............................

ओस जब बन बूँद बहती, पात का कम्पन मे छा रहा है
नीर का देखा रुदन किसने यह पे ,पीर वो भी संग ले के जा रहा है

लोग जो हैं अब तलक मुझसे मिले ,शब्द से रिश्तो में अंतर आ रहा है
अर्थ अपने जिन्दगी का ढूँढ़ने में, व्यर्थ ही जीवन यहाँ पे जा रहा है

इन उनीदी आँख के जब स्वप्न टूटे,दर्द में सुख बोध छिपता जा रहा है
तोड़ कर जब दायरे आगे बढ़ा,शून्य में पथ ज्ञान छिनता जा रहा है

प्रश्न बनके कल तलक था सामने,आज वो उत्तर मुझे समझा रहा है
अब अधेरी रात में भी दूर के,दीप का जलना ह्रदय को भा रहा है

स्वरचित..........................................................................................................vikram

शनिवार, 29 दिसंबर 2007

जो खुद को ...........

शाम का समय था .मेरे पास मेरे ग्राम के चाँद मोहम्मद जी आये ,उस समय मेरे पास कुछ शिक्षक गण बैठे हुए थे। लोगो का एक दूसरे के प्रति कैसा व्यवहार होना चाहिए,इसी विषय पर चर्चा चल रही थी। वे भी बैठ कर हम लोगो की बाते सुननें लगे। कुछ देर पश्चात मेरी ओर मुखातिब होकर बोले "जो खुद को अच्छा न लगे वह दूसरो के साथ न करें"। और इसी के साथ हम लोगो की चर्चा भी समाप्त हो गयी।
............vikram