रविवार, 30 दिसंबर 2007

ओस जब बन ............................

ओस जब बन बूँद बहती, पात का कम्पन मे छा रहा है
नीर का देखा रुदन किसने यह पे ,पीर वो भी संग ले के जा रहा है

लोग जो हैं अब तलक मुझसे मिले ,शब्द से रिश्तो में अंतर आ रहा है
अर्थ अपने जिन्दगी का ढूँढ़ने में, व्यर्थ ही जीवन यहाँ पे जा रहा है

इन उनीदी आँख के जब स्वप्न टूटे,दर्द में सुख बोध छिपता जा रहा है
तोड़ कर जब दायरे आगे बढ़ा,शून्य में पथ ज्ञान छिनता जा रहा है

प्रश्न बनके कल तलक था सामने,आज वो उत्तर मुझे समझा रहा है
अब अधेरी रात में भी दूर के,दीप का जलना ह्रदय को भा रहा है

स्वरचित..........................................................................................................vikram

1 टिप्पणी:

Asha Joglekar ने कहा…

प्रश्न बनके कल तलक था सामने, आज वो उत्तर मुझे समझा रहा है
अब अधेरी रात में भी दूर के,दीप का जलना ह्रदय को भा रहा है
क्या बात है !
बहुत ही अच्छा लिखते हैं आप ।